Third Front Politics in Rajasthan: राजस्थान की राजनीति बीते तीन दशक से एक ही पैटर्न पर चल रही है- कभी भाजपा की सरकार और कभी कांग्रेस की। 1993 के बाद से प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का यही चक्र चल रहा है। लेकिन अब 2028 के विधानसभा चुनावों से पहले प्रदेश की सियासत में तीसरा मोर्चा दस्तक देने जा रहा है। ऐसा नहीं है कि तीसरे मोर्चे की कोशिश पहले कभी नहीं हुई। लेकिन इस बार का प्रयास पहले से अधिक स्पष्ट दिखाई दे रहा है। प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पैठ रखने वाले कई नेता और क्षेत्रीय दल एक मंच की तरफ बढ़ते दिख रहे हैं। यह स्थिति भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए चिंता का विषय बन सकती है, क्योंकि तीसरे विकल्प की थोड़ी-सी मजबूती भी राज्य की पारंपरिक राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकती है। तीसरे मोर्चे को लेकर प्रयास पहले भी हुए लेकिन असफल रहे।
2028 के लिए राजनीतिक हलचल गहरी
2018 के चुनाव में हनुमान बेनीवाल ने अपनी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी बनाते हुए 58 सीटों पर चुनाव लड़ा। क्षेत्रीय लोकप्रियता के बावजूद वे केवल तीन सीटें ही जीत पाए। भाजपा से अलग होकर घनश्याम तिवाड़ी ने भी ‘भारत वाहिनी पार्टी’ बनाई और सभी सीटों पर जमानत जब्त करवा बैठे। आम आदमी पार्टी ने पूरे दमखम के साथ मैदान में उतरकर उम्मीदवार उतारे, पर अधिकांश प्रत्याशी 1000 वोट पाने में भी असफल रहे। बसपा के छह विधायक जीते, लेकिन दल बदलकर कांग्रेस में शामिल हो गए और नतीजा बसपा जीतकर भी ‘खाली हाथ’ ही रही। 2023 के चुनावों में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी और आजाद समाज पार्टी ने तीसरे मोर्चे की छवि गढ़ने की कोशिश की, लेकिन ये प्रयास भी आगे नहीं बढ़ सके। लेकिन 2028 के लिए राजनीतिक हलचल गहरी प्रतीत हो रही है।
तीसरे मोर्चे को गढ़ने में लगे ‘नरेश मीणा’
हाड़ोती क्षेत्र में नरेश मीणा बीते दो सालो में तीन चुनाव लड़कर अपना मजबूत पैर जमा चुके है। कांग्रेस से निष्कासित होने के बाद उन्होंने भगत सिंह सेना के नाम से संगठन खड़ा किया। तीन चुनाव लड़कर भले ही हारे, लेकिन उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों के समीकरणों में सेंध लगाने का काम किया। नरेश मीणा ने जहां-जहां चुनाव लड़ा, वहां दोनों दलों के पारंपरिक वोट बैंक पर प्रभाव डाला। उनका जनाधार युवाओं और ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार मजबूत हो रहा है।राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यदि ऐसा ही चलता रहा, तो वह 2028 में कम से कम आधा दर्जन सीटों के सियासी समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं।
मजबूत हो रही ‘जाट और मीणा’ सियासत
नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल लंबे समय से तीसरे विकल्प की राजनीति करते रहे हैं। मौजूदा समय में RLP के पास विधानसभा में कोई विधायक नहीं है, लेकिन बेनीवाल की व्यक्तिगत छवि और उनकी जनसभाओं में उमड़ रही भीड़ से यह तो साफ़ है कि उनका प्रभाव जाट बेल्ट में अभी भी मजबूत है। इस बार नरेश मीणा और बेनीवाल की नजदीकियां भी बढ़ी है। यह तालमेल जाट और मीणा बेल्ट में मजबूत पकड़ बनाता हुआ दिखाई दे रहा है।
‘आप’ खोज रही सियासी जमीन
आम आदमी पार्टी ने अंता उपचुनाव में नरेश मीणा के साथ मंच साझा कर संदेश दे दिया कि 2028 में वह सक्रिय रहेगी। AAP का शहरी वोट बैंक सीमित है, लेकिन यदि वह तीसरे मोर्चे का हिस्सा बनती है तो जयपुर, कोटा, बीकानेर और उदयपुर जैसी शहरी सीटों पर इसका असर देखा जा सकता है। साथ ही, दिल्ली और पंजाब की सरकारों के अनुभव के साथ AAP प्रशासनिक मॉडल को एक ‘वैकल्पिक राजनीति’ के रूप में पेश कर सकती है।
तीसरे मोर्चे को बढ़त दिलाएगी ओवैसी की पार्टी
वहीं दूसरी तरफ असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM राजस्थान में सक्रिय होने का प्रयास कई बार कर चुकी है। इस बार तीसरे मोर्चे में उसके शामिल होने की संभावनाओं को भी बल मिल रहा है। अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा असर कांग्रेस के परंपरागत अल्पसंख्यक वोटों पर पड़ेगा। अल्पसंख्यक मतदाता प्रदेश की लगभग 35 से 40 सीटों पर अहम् भूमिका निभाते हैं। इन सीटों पर AIMIM कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकती है और तीसरे मोर्चे को बढ़त दिला सकती है।
आदिवासी बेल्ट में मजबूत हो रही ‘बीएपी’
दक्षिण राजस्थान में भारत आदिवासी पार्टी का उभार भी लगातार बढ़ रहा है। पार्टी के पास एक सांसद और चार विधायक हैं, और वह बांसवाड़ा-डूंगरपुर-प्रतापगढ़ बेल्ट में पहले से ही मजबूत पकड़ बना चुकी है। यदि यह पार्टी तीसरे मोर्चे का हिस्सा बनती है तो दक्षिण राजस्थान कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए मुश्किल क्षेत्र साबित हो सकता है। आदिवासी मतदाता क्षेत्रीय दलों की तरफ तेजी से झुक रहे हैं और यह रुझान 2028 में भी जारी रहने की संभावना है।
दलित वोट बैंक को प्रभावित करेंगे चंद्रशेखर
चंद्रशेखर आजाद का प्रभाव सीमित है, पर दलित राजनीति में उनकी मौजूदगी मायने रखती है। आजाद समाज पार्टी यदि मोर्चे का हिस्सा बनती है तो दलित वोट बैंक में सेंध लगना संभव है। बाड़मेर की शिव सीट से निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी युवा वोटरों में लोकप्रिय चेहरा हैं। यदि भाटी इस मोर्चे में शामिल होते हैं, तो पश्चिमी राजस्थान में इसकी मजबूती और बढ़ जाएगी। यदि तीसरा मोर्चा सभी प्रमुख क्षेत्रीय और सामाजिक दलों को साथ लेकर चुनाव मैदान में उतरता है, तो सबसे अधिक प्रभावित कांग्रेस होगी। ऐसी स्थिति में भाजपा को लाभ मिल सकता है। संभव है राज्य में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हो जाए।
लेखक – आकाश अग्रवाल