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‘एक रुपये’ से लिखी गई सामाजिक परिवर्तन की कहानी – बीएल बैरवा

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Last updated: December 31, 2025 7:11 pm
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Abhishek Bairwa Marriage Set to Example for Community
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Abhishek Bairwa Marriage Set to Example for Community : कुछ लेख लिखते हुए मैं स्वयं को बेहद गौरवान्वित महसूस करता हूं। दिनांक 11 दिसंबर 2025 को ऐसे ही एक बेहद खास अवसर का गवाह बनने का मौका मिला मौका था मेरी बुआ के लड़के मेरे छोटे भाई अभिषेक बैरवा की शादी का लेकिन यह केवल एक शादी नहीं थी। यह एक प्रहार था शिक्षा का कुरीतियों पर क्योंकि हमारी राजस्थान की यह वीर धरा अपने गौरवशाली इतिहास और समृद्ध संस्कृति के लिए जानी जाती है, लेकिन समय के साथ यहाँ की सामाजिक संरचना में ‘दहेज’ जैसी कई कुरीतियाँ गहराई से अपनी जड़ें जमा चुकी हैं।

Contents
‘एक रुपया’ – स्वाभिमान का प्रतीकयुवाओं के लिए एक नई प्रेरणासमाज पर व्यापक प्रभावबैरवा समाज का गौरव

समाज में अपनी झूठी प्रतिष्ठा झूठी प्रतिष्ठा, चमक-धमक और दिखावे के दौर में जहाँ शादियाँ ‘सौदे’ बनती जा रही हैं, वहीं टोंक जिले की निवाई तहसील के ग्राम बहकवा, के रहने वाले एक गरीब ओर साधारण परिवार में जन्मे भाई अभिषेक बैरवा ने अपने पिता (श्री रामावतार बैरवा, सेवानिवृत्त इतिहास व्याख्याता ) के द्वारा मिली शिक्षा ओर आदर्शों पर चलते हुए एक नई मिशाल समाज के सामने पेश की है। केंद्र की सरकारी नौकरी, विद्युत मंत्रालय के अंतर्गत DVC में सहायक प्रबंधक के पद पर रहने और ऊँची शिक्षा के बावजूद, उन्होंने दहेज के लालच को दरकिनार कर मात्र 1 रुपया और नारियल स्वीकार कर अजमेर के श्री गोपाल टाटीवाल जी की सुपुत्री रेखा (सरकारी शिक्षिका) से दिनांक 11 दिसंबर 2025 को सर्व समाज के गणमान्य लोगों ओर रिश्तेदारों के बीच एक ऐसा साहसिक कदम उठाया है, जो न केवल बैरवा समाज के लिए, बल्कि सभी समाजों पूरे राजस्थान और देश के युवाओं के लिए एक नई मिशाल है।

उन्होंने दहेज की भारी-भरकम मांगों और दिखावे को दरकिनार करते हुए, शगुन के रूप में मात्र ‘एक रुपया और नारियल’ (कन्या और कलश) स्वीकार कर विवाह रचाया है। यह शादी उन लोगों के गाल पर भी एक तमाचा है जो समाज में दिखावे के लिए कन्या ओर कलश लेकर शादी करते है लेकिन दहेज रूपी दानव से वो बच नहीं पाते उनका दहेज में मांगकर लिया हुआ समान समाज की नजरों से छुपाकर उनके घर पहुंचा दिया जाता है।

भाई अभिषेक ओर रेखा की शादी केवल एक शादी नहीं, बल्कि उन कुरीतियों के खिलाफ जंग है जो बेटियों के पिता को कर्ज के बोझ तले दबा देती हैं। आज के दौर में जहाँ हम मंगल ग्रह पर पहुँचने की बातें करते हैं, वहीं शादी-ब्याह के बाजार में दूल्हे की ‘बोली’ लगना एक कड़वी सच्चाई है। (खासकर जब लड़का सरकारी नौकरी या अच्छे पद पर हो) राजस्थान के कई ग्रामीण और शहरी इलाकों में आज भी बेटी की शादी का मतलब पिता पर कर्ज का भारी बोझ होता है। दिखावे की इस संस्कृति ने कई परिवारों को आर्थिक रूप से तबाह कर दिया है। ऐसे में अभिषेक बैरवा का यह फैसला किसी क्रांतिकारी बदलाव से कम नहीं है।

‘एक रुपया’ – स्वाभिमान का प्रतीक

अभिषेक ने अपनी शादी में लाखों के दहेज को ठुकरा कर यह संदेश दिया कि बेटी स्वयं में लक्ष्मी है, वह कोई व्यापार की वस्तु नहीं है। “कन्या और कलश” के साथ मात्र एक रुपया स्वीकार करना यह दर्शाता है कि रिश्तों की बुनियाद पैसों पर नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और प्रेम पर टिकी होनी चाहिए। यह कदम उन लोगों के मुँह पर तमाचा है जो शिक्षा और सरकारी नौकरी को दहेज की रकम बढ़ाने का जरिया मानते हैं।

युवाओं के लिए एक नई प्रेरणा

अक्सर समाज में युवा पीढ़ी पुरानी रूढ़ियों को कोसती तो है, लेकिन जब खुद की बारी आती है, तो वे परिवार के दबाव या लालच में आकर दहेज प्रथा का हिस्सा बन जाते हैं। भाई अभिषेक बैरवा ने इस परिपाटी को तोड़ा है। उन्होंने साबित कर दिया है कि शिक्षा का असली अर्थ चरित्र निर्माण और सामाजिक सुधार है। परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से होती है। सच्ची ‘मिशाल’ बातों से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से पेश की जाती है।

समाज पर व्यापक प्रभाव

जब समाज का कोई पढ़ा-लिखा युवक ऐसी पहल करता है, तो उसका प्रभाव दूरगामी होता है। गरीब परिवारों को संबल: इससे उन पिताओं को हिम्मत मिलती है जिनकी बेटियों की शादी सिर्फ पैसों की कमी के कारण रुकी होती है।

बैरवा समाज का गौरव

इस पहल से बैरवा समाज ने प्रदेश स्तर पर एक प्रगतिशील समाज होने का परिचय दिया है। दिखावे की संस्कृति का अंत: यह फिजूलखर्ची को रोककर सादगीपूर्ण जीवन को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम है। भाई अभिषेक बैरवा का यह विवाह केवल दो व्यक्तियों या दो परिवारों का मिलन नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन की आहट है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि एक बेटी का हाथ थामना ही सबसे बड़ा उपहार है। यदि राजस्थान का हर युवा भाई अभिषेक की तरह संकल्प ले ले, तो वह दिन दूर नहीं जब ‘दहेज मुक्त राजस्थान’ का सपना हकीकत में बदल जाएगा। जहां तक मेरा मानना है भाई अभिषेक और उनके परिवार का यह निर्णय पीढ़ियों तक याद रखा जाएगा और आने वाले समय में अनगिनत लोगों को सही मार्ग दिखाएगा। अभिषेक भाई को इस साहसिक निर्णय के लिए मेरे ओर समाज के सभी युवाओं की ओर से दिल से धन्यवाद, सलाम!

लेखक – बी एल बैरवा

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